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Dard chupa ke dekh liya

ज़ख्मों का दर्द, छुपा के देख लिया हमने
अपने ज़िगर को, जला के देख लिया हमने
किसी को ग़म नहीं हमारे रंज़ ओ गम का
अपना आशियाँ, जला के देख लिया हमने
अब तो देखने को नहीं बाक़ी बचा कुछ भी,
बर्बादी का राज़, सब को बता दिया हमने
वो हमारे बन कर भी हमसे दूर हो गये,
उनके अनेक चेहरों को, देख लिया हमने
कोई बिसात नहीं हमारी उनकी नज़रों में,
उनकी बेवफाई का आलम, देख लिया हमने
कोई फ़र्क़ उनकी बेवफा नज़रों में न दिखा,
उनके मोहल्ले में, जाकर देख लिया हमने
 

Har kadam pe rona aaya

ज़िंदगी तेरे हर कदम पे रोना आया
तेरे सफर की हर डगर पे रोना आया
कैसे जिया हूँ अब तक ये खुदा जाने,
आज उसके भी करम पे रोना आया
कभी मुकद्दर तो कभी वक़्त से गिला,
मुझे तो तेरे हर भरम पे रोना आया
नचाया है खूब अपने इशारों पे मुझे,
मुझे तो मेरी बदनसीबी पे रोना आया
कहते हैं कि ज़िंदगी हसीन होती है,
पर मुझे तो तेरे हुस्न पे रोना आया
इसके चंगुल में ऐसा फंसा हूँ दोस्त,
कि मुझे तो अपने जीने पे रोना आया...

Kaise Khyal Dil Mein Aa Rahe

जाने कैसे ख्याल दिल में चले आ रहे हैं
कोई मंज़िल नहीं फिर भी चले जा रहे हैं
ये दिले नादान इतना उदास मत हो
तेरी ही ख़ातिर हम यूं गम पिये जा रहे हैं

#मोहब्बत का ये कैसा मुकाम है यारो
हार कर भी जीत की बात किये जा रहे हैं
नतीज़ा पता हैं फिर भी न जाने क्यों
हम ख़्वाबों के गहरे भंवर में फंसे जा रहे हैं

ज़िंदगी में उजाला था उनकी वजह से
अब तो मुस्तकिल अंधेरों में घिरे जा रहे हैं
ऐ हवाओ हमारा पैगाम दे दो उनको
कि हम तो शोला-ए-ज़फा में जले जा रहे हैं...

Zindagi bhar bikharta rha

ज़िंदगी के सफर में, मैं बिखरता ही रहा
गिर गिर के फिर से, मैं संवरता ही रहा
आते रहे ग़म के तूफ़ां रस्ते में लेकिन,
दिल में हौसले का सूरज, चमकता ही रहा
गर्दिशों में न मिला सहारा अपनों से ज़रा,
मुसाफिर की तरह यूं ही, मैं भटकता ही रहा
पल पल सिमटते गये ज़िंदगी के लम्हें,
न मिला हमसफ़र कोई, मैं मचलता ही रहा
चंद कदमों का फासला ही बचा है अब,
सुकून ही सुकून है जिसको, मैं तरसता ही रहा...

Zindagi to viran hai

ज़िंदगी तो वीरान है, और बस कुछ भी नहीं
यूं धड़कनें ही शेष है, और बस कुछ भी नहीं
दुनिया के अजब चक्र में फंस गया हूँ मैं यारो,
इतना सा फसाना है, और बस कुछ भी नहीं
कोई ख्वाहिश न बची कुछ भी पाने की अब,
ज़रा सा प्यार चाहिये, और बस कुछ भी नहीं
ज़िंदगी के सफर में कांटों की कमी नहीं यारो,
अकेला ही चलूँगा मैं, और बस कुछ भी नहीं
मिलाया था हाथ जिनसे अपना समझ कर,
उसने ही दिया धोखा, और बस कुछ भी नहीं
अपनो से ज्यादा तो गैरों ने समझा मुझे,
दूर की सलाम काफी है, और बस कुछ भी नहीं...

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