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Aadat Badalti Nahi

अपने को अब भाती नहीं, शरारत किसी की,
अब तो समझ आती नहीं, इबारत किसी की !
कोई उठाये भले ही तबालतें उम्र भर यूं ही,
पर बदलती नहीं है दोस्तों, आदत किसी की !
#ज़िन्दगी मिली है तो ज़रा प्यार से जी लो इसे,
फ़िज़ूल में क्यों लेते उधार, अदावत किसी की !
इज़्ज़त है अब उसी की है जिसके पास दौलत,
अब तो न काम आती इधर, शराफत किसी की !
न गुनगुनाइए #दोस्त अब चाहत के वो तराने,
इधर ख़ुदा भी न सुनता अब, इबादत किसी की !!!

Zindagi Ka Afsos Na Karo

जब कभी बादल, मेरे आँगन पे गरजते हैं,
तब तब उनकी यादों के, साये लरजते हैं !
कैसे भुलाएं वो #मोहब्बत के हसीन लम्हें,
उनके सहारे तो, सुबह ओ शाम गुज़रते हैं !
वो तो पूंछते हैं #नफ़रत से हमारा रिश्ता,
हम हैं कि इसे उनका, अंदाज़ समझते हैं !
कोई कैसे भूल सकता है अपने वादे इरादे,
पर अफ़सोस, जुबां से लोग कैसे पलटते हैं !
यही #ज़िन्दगी है दोस्त अफ़सोस मत करिये,
इधर तो ऐसे ही, हर पल नज़ारे बदलते हैं !!!

Yaad Unka Ilzam Aata Hai

न दिन को चैन, न रातों को आराम आता है,
है पाया #नसीब ऐसा, कि दर्द बेलगाम आता है !
न रहा कुछ बाक़ी इस बुत से शरीर में दोस्त,
#दिल को तो याद उनका, बस इल्ज़ाम आता है !
बरसती हैं सावन की घटायें हो कर आँखों से,
अब हर हवा का झोखा, दर्द का पैगाम लाता है !
अगर जीना है #ज़िन्दगी तो दर्द को भूलो दोस्त ,
यूं ही घुट घुट के जीना, मुश्किलें तमाम लाता है !!!

Ajeeb Dunia Kyun Banai

तूने ऐ ख़ुदा, ये अजीब दुनिया क्यों बनाई,
#मोहब्बत बनाई, तो फिर नफ़रत क्यों बनाई !
जब तेरी ही तासीर है हर इंसान में ऐ रब,
तो फिर #दोस्ती बना के, दुश्मनी क्यों बनाई !
सुना है कि तू ही लिखता है मुकद्दर सभी के,
बस इतना बता दे कि, बदनसीबी क्यों बनाई !
जब तेरी ही औलाद है दुनिया का हर #इंसान,
तो फिर तूने, अमीरी और गरीबी क्यों बनाई !
जब तू ही समाया है हर तरफ हर ज़र्रे में रब,
फिर हर चीज़ तूने, अपनी परायी क्यों बनाई !
क्या मज़ा आता है तुझे दुनिया के इस खेल में,
बेइज़्ज़ती बनानी थी, फिर इज़्ज़त क्यों बनाई !
जब मौत ही है आखिरी मंज़िल हम सभी की,
तो फिर भटकने को तूने, ज़िन्दगी क्यों बनाई !

Gam Kam Nahi Hote

झूठी दिलासा से, गम कभी कम नहीं होते,
बाद मरने के भी, ये झंझट कम नहीं होते !
ज़रा रखिये खोल कर अपनी आँखे ज़नाब,
दुश्मनी करने में, अपने भी कम नहीं होते !
लफ़्ज़ों का कितना ही मरहम लगाए कोई,
पर दिल पे लगे ज़ख्म, कभी कम नहीं होते !
चरागों के बुझाने से भला क्या होगा दोस्त,
अंधेरों में छुप जाने से, गुनाह कम नहीं होते !
भले ही सारी ज़ागीर दे दो किसी को दोस्त,
मगर तब भी अरमान उसके, कम नहीं होते !