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Nafrat Thi Dil Mein

नफ़रत थी दिल में, तो इज़हारे प्यार क्यों कर बैठे,
#मोहब्बत के नाम पर, ज़िंदगी निसार क्यों कर बैठे !
जब छोड़ के ही भागना था बीच रस्ते से अय दोस्त,
तो फिर चलने का साथ मेरे, इक़रार क्यों कर बैठे !
जिधर देखो उधर दुश्मन ही तो दुश्मन हैं जहान में,
फिर बेताबियाँ के चलते, खुद पर वार क्यों कर बैठे !
जब पता ही था कि मंज़िलें आसान नहीं हुआ करतीं,
फिर दरम्याने सफर, दिल को बेक़रार क्यों कर बैठे !
चाहतों के मसले पे दिल को संभाल कर रखिये "मिश्र",
अरे आसमां की चाहत में, सितारों से रार क्यों कर बैठे !

Sholon ko mat kurediye

जो दब चुके हैं राख में, उन शोलों को मत कुरेदिए !
जो भर चुके हैं जैसे तैसे, उन घावों को मत कुरेदिए !

बदल देते हैं खेल सारा वो अतीत के नापाक मंजर,
अब गुज़र चुके जो पीछे, उन लम्हों को मत कुरेदिए !

अतीत के गुलशन से बस चुनिए तो फूल खुशियों के,
भाई आये हो छोड़ पाछे, उन ख़ारों को मत कुरेदिए !

इन लफ़्ज़ों की मार से मैंने देखे है कितने ही घायल,
अरे जो बसा रखे है दिल में, उन भावों को मत कुरेदिए !

यहां पे हर किसी को हक़ है अपनी ज़िन्दगी जीने का,
फिर मज़हब के नाम पे, उनके मनों को मत कुरेदिए !

ये जमाना तो सब्र कर लेता है हर तरह से ही "मिश्र",
यूं सियासत के नाम पे, उसके जज़्बों को मत कुरेदिए !

Kisi Ke Dukh Mein

अब किसी के दुःख में, भला कोंन मरा करता है,
अब किसी के हक़ में, भला कोंन दुआ करता है !

सभी तो दिखते हैं मगन अपने ख़्वाबों ख़यालों में,
जफ़ाओं की दुनिया में, भला कोंन वफ़ा करता है !

इक उम्र गुज़र जाती है अपना आशियाँ बनाने में,
कर देते हैं खाक पल में, भला कोंन दया करता है !

क्यों है वो इतना खुश हमें तो ग़म है सिर्फ इसका,
शामिल किसी के ग़म में, भला कोंन हुआ करता है !

अब तलाशते हैं "मिश्र" सब मंज़िलें अपनी अपनी,
यूं मेहरवाँ किसी और पे, भला कोंन हुआ करता है !

Ye Tarane Badal Gye

क्यों कर न जाने दिल के, ये तराने बदल गए
जो साधे थे कभी हमने, वो निशाने बदल गए

हम तो ढोते रहे बस यूं ही #ज़िन्दगी को यारो,
हमारा वक़्त क्या बदला, कि जमाने बदल गए

गैरों की बात छोडो अपने न रहे साथ अब तो,
मतलब के हिसाब से, उनके बहाने बदल गए

जो कल तक निवास करते थे हमारे दिल में,
मौसम के हिसाब से, उनके ठिकाने बदल गए

हम कहाँ तक संभालें ये जज़्बात अपने,
इस कदर बदला समां, कि फसाने बदल गए...

Zindagi Dekhni Hai To

मत समझो पत्थरों की दुनिया को सब कुछ,
गर तुमको देखनी है ज़िंदगी, तो गाँव चलिए !

मिटा डाला है जो क़ुदरत का सामान तुमने,
गर तुमको देखना है फिर से, तो गाँव चलिए !

तुम्हें कैसे रास आती हैं ये शहर की हवाएं,
गर सांस लेना है तुम्हें चैन की, तो गाँव चलिए !

क्यों घुमते फिरते हो तुम न जाने कहाँ कहाँ,
है देखना कुदरत का खज़ाना, तो गाँव चलिए !

न जानता है कोई इधर कि कोंन है पड़ोस में,
अगर देखने हैं दिलों के रिश्ते, तो गाँव चलिए !

सूरज की रौशनी भी न देख पाते कुछ लोग तो,
गर देखना है ऊषा का आँचल, तो गाँव चलिए !

यूं किस तरह से जीते हो इस शोरगुल में यारो,
गर सुननी है कूक कोकिल की, तो गाँव चलिए !

मिटा डाली है गरिमा ही तुमने हर त्यौहार की
गर तुमको देखने हैं ढंग असली, तो गाँव चलिए !

सोने चांदी से पेट भरता नहीं किसी का भी "मिश्र",
गर तुमको देखना है अन्नदाता, तो गाँव चलिए !