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Khud Ko Bhula Baithe

हम औरों की चाह में, ख़ुद को भुला बैठे !
इन झूठों के फरेब में, सच को भुला बैठे !

इस कदर खोये इस मतलबी दुनिया में,
कि हड़पने की हवस में, हद को भुला बैठे !

हम छोड़ आये पीछे न जाने कितनी यादें,
यारो आज की धमक में, कल को भुला बैठे !

दौलत को बना रखा है अब तो ख़ुदा सबने,
यारो वैभव की चमक में, रब को भुला बैठे !

समेंट डाली ज़िंदगी सिर्फ अपने तक "मिश्र",
अब तो शान के गुमान में, सब को भुला बैठे !

Badalte Dekha Hai Humne

न जाने कितनों को, बदलते देखा है हमने
कितने रिश्तों को, बिखरते देखा है हमने

यहाँ क़ाबिले यक़ीं तो कोई भी न रहा यारो,
बहुतों की वफ़ा को, पिघलते देखा है हमने

न करो बात उल्फ़त की क्या रखा है उसमें,
प्यार के परिंदों को, फिसलते देखा है हमने

झूठी तसल्लियों से कभी दिल नहीं बहलते,
गैरों के साथ उनको, थिरकते देखा है हमने

ये बेरहम दुनिया न समझती दुःख किसी के,
जनाज़े में लोगों को, चहकते देखा है हमने

शर्म आती है हमको जब देखते हैं ऐसे सितम,
यतीमखाने में माँ को, बिलखते देखा है हमने

कभी बुलंदियों पे थे जिनके मुकद्दर के सितारे,
जमीं पे दरबदर उनको, भटकते देखा है हमने

न करता कोई भी मोहब्बत अब किसी से,
हर दिल में नफरतों को, भड़कते देखा है हमने...

Chahat Kam Nahi Hai

यारो ज़िंदगी के सफर में, जलालत कम नहीं है
हर कदम पर फिसलने की, हालत कम नहीं है

मुश्किलों का दौर तो आता है आता ही रहेगा,
पर हमारे दिल में किसी को, चाहत कम नहीं है

क्या देखते हो हमारे चेहरे की बेचैनियां दोस्त,
हमारे दिल में धड़कनों की, आहट कम नहीं है

इन राहों की ठोकरों से तो बावस्ता हैं हम भी
मगर उनसे निजात पाने की, ताकत कम नहीं है

सच है कि उलझे हैं ज़िंदगी की कश्मकश में हम,
मगर खुशियों को बंटाने की, आदत कम नहीं है

हर वक़्त अपने अश्कों को मत दिखाइए "मिश्र",
इस दुनिया में हर किसी को, तवालत कम नहीं है

Zara Sambhal Ke Chaliye

यारो यूं नफरतें कमाने में क्या रखा है,
सब को दुश्मन बनाने में क्या रखा है !

कद्र करनी है तो जीते जी करो दोस्त,
वरना तो बाद दफनाने के क्या रखा है !

जीते जी न देखा कभी चेहरा जिसका,
अब कफ़न उठाने में भला क्या रखा है !

चुन लो ज़िंदगी के मेले से खुशियां यारो,
वर्ना तो बाद उजड़ जाने के क्या रखा है !

गलतियां तो हर सख्स से होती हैं दोस्त,
किसी की इज़्ज़त गिराने में क्या रखा है !

चलना है तो ज़रा संभल के चलिए ,
वरना तो यूं ठोकरें खाने में क्या रखा है !

Kaun Apna Kaun Praya

चाहत की इस दुनिया में, केवल व्यापार मिले मुझको
चाहा जिसे फूलों की तरह, उससे ही खार मिले मुझको

कैसे जीया हूँ कैसे मरा हूँ, किसी को कोई गरज नहीं,
दिल में घुस के घात करें, कुछ ऐसे यार मिले मुझको

अपना पराया करते करते, ये जीवन ही सारा गुज़र गया,
ना रही खनक अब रिश्तों में, झूठे इक़रार मिले मुझको

जिसके साथ हँसे खेले, जीवन भर जिसको प्यार किया,
उसने ही कपट की चाल चली, ऐसे किरदार मिले मुझको

यहाँ कौन है अपना कौन पराया, कैसे समझूँ इनको मैं,
ना मिली शराफत ढूंढें से, केवल मक्कार मिले मुझको !!!