कभी तो बहार आएगी, कभी नूरे चमन बदलेगा ,
ख़ुदा पे है यकीं इतना कि, कभी तो करम बदलेगा !
आएगा कभी होठों पे किलकारियों का मौसम भी,
यारो कभी तो ज़र्द चेहरे का, कुछ तो रंग बदलेगा !
हम आज तो बदनाम हैं पहचानता हमें कोई नहीं,
कभी तो दिल से लोगों के, वो पुराना भरम बदलेगा !
कुछ भी न बदला अब तक सब कुछ तो है वैसा ही,
जीता रहा इस आस में कि, कभी तो वतन बदलेगा !!!
ये तो अच्छा हुआ कि
1947 में #WhatsApp और #Facebook नहीं था,
वरना आज़ादी के लिए कोई जंग में उतरता ही नहीं,
लोग घर बैठे ही कहते कि
इस #Msg को इतना फैलाओ
कि अंग्रेज खुद भारत छोड़कर भाग जाए !!!
कुछ कहने की कुछ सुनने की, हिम्मत न रही अब,
यूं हर किसी से सर खपाने की, हिम्मत न रही अब !
हम भी बदल गए हैं तो वो भी न रहे बिल्कुल वैसे,
सच तो ये है कि उनको भी, मेरी ज़रुरत न रही अब !
अब फ़ुरसत ही नहीं कि कभी उनको याद कर लें,
ख़ैर उनको भी हमारे जैसों से, #मोहब्बत न रही अब !
देखना था जो तमाशा सो देख लिया इस जमाने ने,
मैं तो भूल गया सब कुछ, कोई #नफ़रत न रही अब !
सोचता हूँ कि जी लूँ कुछ पल और #ज़िंदगी के बस ,
यूं भी वक़्त का मुंह चिढ़ाने की, फ़ितरत न रही अब !