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Kisi Ke Dukh Mein

अब किसी के दुःख में, भला कोंन मरा करता है,
अब किसी के हक़ में, भला कोंन दुआ करता है !

सभी तो दिखते हैं मगन अपने ख़्वाबों ख़यालों में,
जफ़ाओं की दुनिया में, भला कोंन वफ़ा करता है !

इक उम्र गुज़र जाती है अपना आशियाँ बनाने में,
कर देते हैं खाक पल में, भला कोंन दया करता है !

क्यों है वो इतना खुश हमें तो ग़म है सिर्फ इसका,
शामिल किसी के ग़म में, भला कोंन हुआ करता है !

अब तलाशते हैं "मिश्र" सब मंज़िलें अपनी अपनी,
यूं मेहरवाँ किसी और पे, भला कोंन हुआ करता है !

Ye Tarane Badal Gye

क्यों कर न जाने दिल के, ये तराने बदल गए
जो साधे थे कभी हमने, वो निशाने बदल गए

हम तो ढोते रहे बस यूं ही #ज़िन्दगी को यारो,
हमारा वक़्त क्या बदला, कि जमाने बदल गए

गैरों की बात छोडो अपने न रहे साथ अब तो,
मतलब के हिसाब से, उनके बहाने बदल गए

जो कल तक निवास करते थे हमारे दिल में,
मौसम के हिसाब से, उनके ठिकाने बदल गए

हम कहाँ तक संभालें ये जज़्बात अपने,
इस कदर बदला समां, कि फसाने बदल गए...

Zindagi Dekhni Hai To

मत समझो पत्थरों की दुनिया को सब कुछ,
गर तुमको देखनी है ज़िंदगी, तो गाँव चलिए !

मिटा डाला है जो क़ुदरत का सामान तुमने,
गर तुमको देखना है फिर से, तो गाँव चलिए !

तुम्हें कैसे रास आती हैं ये शहर की हवाएं,
गर सांस लेना है तुम्हें चैन की, तो गाँव चलिए !

क्यों घुमते फिरते हो तुम न जाने कहाँ कहाँ,
है देखना कुदरत का खज़ाना, तो गाँव चलिए !

न जानता है कोई इधर कि कोंन है पड़ोस में,
अगर देखने हैं दिलों के रिश्ते, तो गाँव चलिए !

सूरज की रौशनी भी न देख पाते कुछ लोग तो,
गर देखना है ऊषा का आँचल, तो गाँव चलिए !

यूं किस तरह से जीते हो इस शोरगुल में यारो,
गर सुननी है कूक कोकिल की, तो गाँव चलिए !

मिटा डाली है गरिमा ही तुमने हर त्यौहार की
गर तुमको देखने हैं ढंग असली, तो गाँव चलिए !

सोने चांदी से पेट भरता नहीं किसी का भी "मिश्र",
गर तुमको देखना है अन्नदाता, तो गाँव चलिए !

Dil Pathar Na Ho Jaye

कहीं ज़िंदगी हमारी, बदतर न हो जाए
कहीं ये दिल हमारा, पत्थर न हो जाये
उगाते रहिये फसलें ग़म या ख़ुशी की,
कहीं ये दिल की जमीं, बंजर न हो जाये
न होइए गुम इस गुलशन की फिज़ा में,
यारा कहीं कोई गुल ही, खंज़र न हो जाए
ज़रा सा काबू में रखिये अपने दिल को,
कहीं ज़िन्दगी का ढांचा, जर्जर न हो जाये
इस खामोश हवा से भी ज़रा यारी रखिये ,
कहीं बदल के तासीर, बवण्डर न हो जाए
समेट के रखिये ग़मों के दरिया को ,
कहीं किनारे तोड़ कर, समन्दर न हो जाए...

Taqdeer mita daali

हमने तो इन हाथों की, हर लकीर मिटा डाली,
अपने ही हाथों से, अपनी तक़दीर मिटा डाली
कभी जलवे हुआ करते थे रंगीन महफ़िलों के,
पर इस वक़्त ने उनकी, हर तस्वीर मिटा डाली
मालूम न था कि आँखों में है ख्वाबों का ज़खीरा,
हमने तो अपनी नींदों की, तासीर मिटा डाली
कभी हम भी पहुँच जाते अपनी मंज़िल पे यारो,
अफसोस कि हमने तो, हर तदबीर मिटा डाली
अब न रहा याद कुछ भी भुला दीं सब कहानियां,
हमने तो खुद के दिल से, हर तहरीर मिटा डाली
अब थक चुके हैं हम तो दर्द सुनाते सुनाते,
हमने तो अपनी जुबां से, हर तक़रीर मिटा डाली