Shanti Swaroop Mishra

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Waqt ganvaya mat kariye

बेकार अपने वक़्त को, गंवाया मत करिये
हर जगह अपनी टांग, फंसाया मत करिये
कोई भी किसी से कम नहीं है आज कल,
बेसबब किसी पे धौंस, जमाया मत करिये
ख़ुराफ़ातों से न मिला है न मिलेगा कुछ भी,
यूं हर वक़्त टेढ़ी चाल, दिखाया मत करिये
ये ज़िन्दगी है यारो इसे मोहब्बत से जीयो,
इसमें नफ़रतों का पानी, चढ़ाया मत करिये
गर उलझन है अपनों से तो सुलझाइये खुद,
मगर शोर घर से बाहर, मचाया मत करिये
अब तो न बचा है कोई भी भरोसे के लायक,
किसी को दिल की बात, बताया मत करिये
ज़िन्दगी का मसला कोई खेल नहीं है ‘मिश्र’,
कभी बेवजह इसको, उलझाया मत करिये...
 

Marna Bhi Aa Gya

जीना भी आ गया, हमें मरना भी आ गया.
लोगों की नज़र को, हमें पढ़ना भी आ गया .
यूं ही तो नहीं गुज़ारी है ये ज़िन्दगी हमने,
दिलों की धड़कनें, हमें परखना भी आ गया !

मुखौटों की आड़ में बहुत लुट चुके हैं हम,
भोली सूरतों को, हमें समझना भी आ गया !
हँसते थे हम भी औरों की मुश्किलें देख कर ,
मगर अब तो खुद पे, हमें हँसना भी आ गया !

सर झुकाये रहे तो लोग ठगते रहे जी भर के,
अब तो सर उठा के, हमें चलना भी आ गया !
बड़ी ही टेढ़ी चाल है ज़ालिम ज़माने की "मिश्र",
पर कदम पर कदम, हमें रखना भी आ गया !

Meri aadat nahi hai

किसी से बहस करना, मेरी आदत नहीं है
बेकार उलझते फिरना, मेरी आदत नहीं है
यहाँ कैसे जी रहा हूँ कोई मेरे दिल से पूंछे,
मेरी ज़िन्दगी है यारो, कोई सियासत नहीं है
अगर सीधी भी हों राहें तो भी क्या फायदा,
न मिलेगी मंज़िल,गर दिल में ताकत नहीं है
मैं भी चाहता हूँ मोहब्बत की ज़िन्दगी यारो,
मेरी तो यूं भी किसी से, कोई अदावत नहीं है
ज़रा बच के रहना रहनुमाओं के मुखौटों से,
खुदा खैर करे यहां, कुछ भी सलामत नहीं है
बदल चुकी हैं अपने वतन की फ़िज़ाएं यारो,
यहाँ सच कहने की अब तो, इज़ाज़त नहीं है
इस ज़रा सी ज़िंदगी में बवाल कितने हैं,
यहाँ तो मरने के बाद भी, अब मोहलत नहीं है...

Sath kab tak rahega

आखिर सांसों का साथ, कब तक रहेगा !
किसी का हाथों में हाथ, कब तक रहेगा !
बस यूं ही डूबते रहेंगे चाँद और सूरज तो,
आखिर रोशनी का साथ, कब तक रहेगा !
अगर जीना है तो चलना पड़ेगा अकेले ही,
आखिर रहबरों का साथ, कब तक रहेगा !
न करिये काम ऐसे कि डूब जाये नाम ही,
आखिर सौहरतों का साथ, कब तक रहेगा !
कभी तो ज़रूर महकेगा उल्फत का चमन,
आखिर ख़िज़ाओं का साथ, कब तक रहेगा !
तुम भी खोज लो ’ ख़ुशी के अल्फ़ाज़,
आखिर रोने धोने का साथ, कब तक रहेगा !

Apno se dar lagta hai

हमें परायों से नहीं, अपनों से डर लगता है
हमें तो सच से नहीं, सपनों से डर लगता है
दिल में चाहत के तूफ़ान तो बहुत हैं मगर,
हमें तो बनावटी, मोहब्बतों से डर लगता है
हमने देखा है बहुत कुछ ज़िंदगी में यारो,
हमें शातिरों से नहीं, शरीफों से डर लगता है
जाने कितने किरदार देखे हैं उम्र भर हमने,
हमें चाशनी में पगी, बातों से डर लगता है
अब न दिखता है कोई मेल चेहरे का दिल से,
हमें दिल में उमड़ते, ज़हरों से डर लगता है
चाहत तो हमारी भी है सितारे छूने की मगर,
हमें आसमां से नहीं, खजूरों से डर लगता है
न समझ लेना ये कि हम तो कायर हैं "मिश्र",
हमें तो शेरों से नहीं, सियारों से डर लगता है