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Shanti Swaroop Mishra

Zindagi Ko Badhaal

ज़ालिम नफरतों ने जीना, मुहाल कर दिया
गुलशन सी ज़िन्दगी को, बदहाल कर दिया

इस दिल में शोले, कुछ इस कदर भड़के,कि
उनकी तपिश ने मुझको, निढाल कर दिया

बमुश्किल मिले थे, मोहब्बत के कुछ लम्हे,
मगर दिल की हरक़तों ने, वबाल कर दिया

कभी अपनी भी सौहरत थी, इस ज़माने में,
पर वक़्त के इस फेर ने, फटेहाल कर दिया

यक़ीं था कि आएगा क़ातिल, सामने से यारो,
पर उसने तो मुझे पीछे से, हलाल कर दिया

मैंने पूछी थी ज़िन्दगी से, उसकी रजा ,
पर उसने तो मुझसे, उल्टा सवाल कर दिया
 

Zara Bach Ke Rehna

लोग अब भी, वो पुराना राग लिए फिरते हैं
सूरज की रोशनी में, चिराग लिए फिरते हैं

इधर तो कहीं भी ठंडक नहीं मिलती यारो,
अब दिलों में भी लोग, आग लिए फिरते हैं

ढूंढते फिरते हैं लोग औरों में ख़म ही ख़म ,
पर वो ख़ुद भी ढेर सारे, दाग लिए फिरते हैं

न जमती हैं लोगों को अब ईमान की बातें,
न जाने लोग कैसा, बददिमाग लिए फिरते हैं

ज़रा बच के ही रहना भोली सूरतों से "मिश्र",
अरे यही तो आस्तीनों में, नाग लिए फिरते हैं

Kabhi kaante kabhi gulaab

ज़िन्दगी में कभी कांटे, तो कभी गुलाब मिलते हैं
कभी मोहब्बतों के रंग, तो कभी अज़ाब मिलते हैं

ये दुनिया तो भरी पड़ी है अजीब से किरदारों से,
कहीं पे गिद्धों की टोली, तो कहीं सुर्खाब मिलते हैं

मत समझ लेना कि सब कुछ बराबर है दुनिया में,
कहीं दौलत ही दौलत, कहीं ख़ानाख़राब मिलते हैं

न समझ पाओगे कभी इस ज़माने की चालों को,
यहाँ मिलते हैं कभी शातिर, कभी जनाब मिलते हैं

अब तो जलवा है हर तरफ जालसाजों का "मिश्र",
कहीं मिलते हैं ज़रा कम, कहीं बेहिसाब मिलते हैं

Dilon mein faansle

चलिए मगर, यूं फासले, मत बनाइये
फ़क़त अपने लिए रस्ते, मत बनाइये
हैं और भी मुसाफिर तेरी राहों के यारा
उनसे दुश्मनी के रिश्ते, मत बनाइये
बिना हमसफ़र के न कट सकेंगी राहें
सरपट सी ज़िंदगी में गड्ढे, मत बनाइये
मोहब्बत के सिवा सारे मज़हब हैं झूठे
दिलों को नफरतों के अड्डे, मत बनाइये
जो कुछ भी है पास वो खुदा की नेमत है
झूठी मिल्कियत के सपने, मत सजाइये
भले ही दूर हैं पर अपने तो अपने हैं "मिश्र"
कभी दिलों में उनसे फासले, मत बनाइये

Achhe Din Bhi Aayenge

आते हैं आज मंहगे, कल सस्ते भी आएंगे
कभी चल कर तेरे क़रीब, रस्ते भी आएंगे
न हो ग़मज़दा इन पतझड़ों से अय बागवाँ,
बची हैं गर शाखें, तो फिर से पत्ते भी आएंगे
समय का चक्र तो घूमेगा अपने हिसाब से,
आये हैं बुरे दिन, तो कभी अच्छे भी आएंगे
न हो #उदास देख कर वीरानगी गुलशन की,
परिंदे बनाने नीड़ अपना, फिर से भी आएंगे
न छोड़िये विटप की परवरिश का सिलसिला,
आज आये हैं फल खट्टे, कल मीठे भी आएंगे
#ज़िन्दगी के इस मेले में आएंगे लोग कैसे कैसे,
गर आएंगे कभी शातिर, तो फ़रिश्ते भी आएंगे