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Rishton Ko Batayein Kaise

गुलशन में लगी आगों को, हम बुझाएं कैसे,
इन #मोहब्बत के परिंदों को, हम बचाएं कैसे !

आँगन में लगे होते तो उखाड़ देते हम यारो,
मगर #दिल में उगे ख़ारों को, हम हटाएँ कैसे !

होता अँधेरा अगर घर में तो जला देते शमा,
पर दिल में भरे अंधेरों को, हम मिटायें कैसे !

न समझा कभी जिसने #नफ़रत के सिवा कुछ,
उनके दिल में मोहब्बतों को, हम बसाएं कैसे !

अब न मिलती इंसानियत ढूढ़ने से कहीं भी,
अब लोगों के सोये ज़ज़्बों को, हम जगाएं कैसे !

अपनी बुलंदियों के गुरूर में ग़ाफ़िल हैं "मिश्र",
फिर जमीं से उनके रिश्तों को, हम बताएं कैसे !

Khushiyon Ki Chahat

गर मंज़िल पास लानी है, तो ख्वाहिशें कम कर दो,
चाहत है अगर खुशियों की, तो रंजिशें कम कर दो !

अब दिखता है हर तरफ फिरकापरस्ती का आलम,
अगर जीना है तुम्हें चैन से, तो साजिशें कम कर दो !

ये सब दौलतें ये सौहरतें तो रहमत है बस खुदा की,
गर चाहो मोहब्बत सब की, तो नुमाइशें कम कर दो !

हर किसी को हक़ है कि जीए ज़िन्दगी अपनी तरह,
बचाये रखनी है अगर इज़्ज़त, तो बंदिशें कम कर दो !

सुकूँ हरगिज़ नहीं मिलता किसी को सताने से "मिश्र",
पानी है दोस्ती की दौलत, तो आजमाइशें कम कर दो !

Khud bhi badalna seekho

समय के साथ, खुद भी तो बदलना सीखो,
दुनिया के ढांचे में, खुद भी तो ढलना सीखो !

हर कदम पे मिलते हैं अजब किरदार अब,
वो कोंन कैसा है, खुद भी तो परखना सीखो !

करता है फ़ना खुद को वो औरों की खातिर,
तुम दीये की तरह, खुद भी तो जलना सीखो !

मिटा देती है हस्ती वो हमारी जीभ की खातिर,
कभी चीनी की तरह, खुद भी तो घुलना सीखो !

बरसता है बादल जमीं की ज़रुरत समझ कर,
औरों की ज़रूरतें, खुद भी तो समझना सीखो !

हर पत्थर समझता है कि इमारत उसी से है,
ऐसी ग़लतफ़हमी से, खुद भी तो बचना सीखो !

क्यों देखते हो हर किसी में सिर्फ कमियां ,
खुद में ख़ास क्या है, खुद भी तो मथना सीखो !

intzaar aaj bhi hai

उनका तो आज भी, इंतज़ार है हमको ,
उनसे आज भी बेपनाह, #प्यार है हमको !

इक दिन तो जरूर आएंगे लौट कर वो,
यारो इतना तो दिल में, क़रार है हमको !

हमने भी खेला है जुआं #ज़िंदगी का यारो,
जीतेंगे ये बाज़ी ज़रूर, ऐतबार है हमको !

रूठे हैं गर तो मनाने की जिद है हमारी,
वो देंगे गर सजा भी, स्वीकार है हमको !

वक़्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता,
वो बदलेगा जरूर, बस इन्तज़ार है हमको !

Dastoor nibhaya humne

हर दस्तूर इस ज़माने का, निभाया हमने,
मगर न पा सके वो यारो, जो चाहा हमने !

न आये कभी काम जिन्हें समझा अपना,
पर उनके हर इशारे पे, सर झुकाया हमने !

बहुत रंग देखे हैं हमने ज़िन्दगी के दोस्तो,
पर उसका न कोई रंग, समझ पाया हमने !

न समझती है ये दुनिया अब दर्द के आंसू,
न कोई मेहरवां दुनिया में, ढूढ़ पाया हमने !

"मिश्र" ज़िन्दगी लगा दी अपनों के फेर में,
पर करें यक़ीं किस पर, न जान पाया हमने !