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Khud bhi badalna seekho

समय के साथ, खुद भी तो बदलना सीखो,
दुनिया के ढांचे में, खुद भी तो ढलना सीखो !

हर कदम पे मिलते हैं अजब किरदार अब,
वो कोंन कैसा है, खुद भी तो परखना सीखो !

करता है फ़ना खुद को वो औरों की खातिर,
तुम दीये की तरह, खुद भी तो जलना सीखो !

मिटा देती है हस्ती वो हमारी जीभ की खातिर,
कभी चीनी की तरह, खुद भी तो घुलना सीखो !

बरसता है बादल जमीं की ज़रुरत समझ कर,
औरों की ज़रूरतें, खुद भी तो समझना सीखो !

हर पत्थर समझता है कि इमारत उसी से है,
ऐसी ग़लतफ़हमी से, खुद भी तो बचना सीखो !

क्यों देखते हो हर किसी में सिर्फ कमियां ,
खुद में ख़ास क्या है, खुद भी तो मथना सीखो !

intzaar aaj bhi hai

उनका तो आज भी, इंतज़ार है हमको ,
उनसे आज भी बेपनाह, #प्यार है हमको !

इक दिन तो जरूर आएंगे लौट कर वो,
यारो इतना तो दिल में, क़रार है हमको !

हमने भी खेला है जुआं #ज़िंदगी का यारो,
जीतेंगे ये बाज़ी ज़रूर, ऐतबार है हमको !

रूठे हैं गर तो मनाने की जिद है हमारी,
वो देंगे गर सजा भी, स्वीकार है हमको !

वक़्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता,
वो बदलेगा जरूर, बस इन्तज़ार है हमको !

Dastoor nibhaya humne

हर दस्तूर इस ज़माने का, निभाया हमने,
मगर न पा सके वो यारो, जो चाहा हमने !

न आये कभी काम जिन्हें समझा अपना,
पर उनके हर इशारे पे, सर झुकाया हमने !

बहुत रंग देखे हैं हमने ज़िन्दगी के दोस्तो,
पर उसका न कोई रंग, समझ पाया हमने !

न समझती है ये दुनिया अब दर्द के आंसू,
न कोई मेहरवां दुनिया में, ढूढ़ पाया हमने !

"मिश्र" ज़िन्दगी लगा दी अपनों के फेर में,
पर करें यक़ीं किस पर, न जान पाया हमने !

Dushman bhi yaar ho gaye

वक़्त संभला, तो दुश्मन भी यार हो गए,
पर ख़ास अपनों के चेहरे, बेज़ार हो गए !
वो दोस्त हुआ करते थे कभी फाकों में,
मगर पेट भरते ही, दौलत के यार हो गए !
न भाता उन्हें तो अब यारों का चेहरा भी,
कभी फूल हुआ करते थे, अब खार हो गए !
अब खो गए वो भी इस मतलबी दुनिया में,
बदवक़्त के साथी भी, अब बदकार हो गए !
कैसे बिकता है ईमान इधर देखा है हमने,
अब तो लोग खुद ही, खुला बाज़ार हो गए !
बन के बरगद जिन्हें छांव दी हमने,
उनकी ही कुल्हाड़ी के, हम शिकार हो गए !

Kab tak rahega

दौर ए गर्दिश का असर, कब तक रहेगा
यूं ही उलझनों का सफर, कब तक रहेगा
कभी तो टूटेगा आदमी का हौसला यारो,
न जाने आफतों का कहर, कब तक रहेगा,
ज़िंदगी लगा दी हमने ज़िंदगी की खोज में,
आखिर मरने जीने का डर, कब तक रहेगा
जिसने मुद्दतें गुज़ार दीं हवाओं से झगड़ते,
आखिए वो बूढा सा शज़र, कब तक रहेगा
भटकता है दिल रौशनी की चाह में हरदम,
आखिर इन अंधेरों का डर, कब तक रहेगा
भुला दी है सब ने "मिश्र" मोहब्बत की भाषा,
आखिर ये नफरतों का ज़हर, कब तक रहेगा