Ek Musafir Ho Tum

बेचैन हो कर, यूं ही, करवटें न बदलते रहिये ,
निराश हो कर, तुम यूं ही हाथ न मलते रहिये !
तुम एक #मुसाफिर हो बस इतना समझ लो,
चलना ही ज़िंदगी है, बैठ कर न उछलते रहिये !
कोंन है जो न गिरता है ज़िन्दगी के सफर में,
मगर यूं ही डर के तुम, राहें न बदलते रहिये !
न कर सको तो ना कहना भी सीख लो दोस्त,
मगर अपने किये वादों से, यूं न फिसलते रहिये !
पार करना है दरिया तो धारे में उतरिये दोस्त,
बैठ कर किनारे पे तुम, यूं ही न मचलते रहिये !!!

Fans gya hoon main

भंवर से बच गया पर, साहिल पे फंस गया हूँ मैं,
बच गया गैरों से मगर, अपनों में फंस गया हूँ मैं !
कुछ ऐसा ही मुकद्दर लिख डाला है रब ने मेरा,
कि आसमां से गिर कर, खजूर में फंस गया हूँ मैं !
मैंने भी चाहा कि उड़ता फिरूं परिंदों कि तरह,
मगर अपनों के बिछाए, जाल में फंस गया हूँ मैं !
मैं गुज़ार लेता ज़िन्दगी भी जो कुछ बची है दोस्त,
मगर खुद के ही मेरे, जज़्बात में फंस गया हूँ मैं !
ज़रा से प्यार की खातिर मिटा डाला सुकूं हमने,
अब तो बस तन्हाइयों के, दौर में फंस गया हूँ मैं !!!

Waqt Ne Sikha Diya

मेहरवानी अय वक़्त, तूने रहना सिखा दिया ,
दुनिया के सारे ग़म, तूने सहना सिखा दिया !
आसान कर दी, अपने परायों की परख तूने,
जो था लबों पर मेरे, तूने कहना सिखा दिया !
कूप मंडूक थे, न पता था बाहर का मिज़ाज़,
मिल के साथ राहों में, तूने चलना सिखा दिया !
लगाते थे तक तक कर, निशाने मुझ पे लोग,
इक बता के नया हुनर, तूने बचना सिखा दिया !
इबारत भोले चेहरों की, न समझ पाए हम,
शुक्रिया अय वक़्त कि, तूने पढ़ना सिखा दिया !

Phool Se Sunder Chehre

फूलों से भी सुंदर चेहरे ऐसे कहीं नहीं होने चेहरे !
खुशियों में अच्छे लगते ना गुस्से साथ फुलाने चेहरे !
जिन्होंने के साथ इश्क कमाया 1 दिन पढ़ते खोने चेहरे !
जिनसे दुख सहार ना होता कमलों जैसे वह रोने चेहरे !
देखना राखस बनकर माताओं कई सदा की नींद सुलाने चेहरे
भगवान तो रहता इंसान के अंदर फिर मंदिर में क्यों झुकाने चेहरे !!!

Dharam Ke Thekedar

देख लेना एक दिन धर्म के ठेकेदार लुट जाएंगे  !
जो  चमचे  बनकर रहते वह सेवादार लुट जाएंगे !
अगर जवानी टहलने लगी फूलों की महको की तरह
सदर बाजारों के सारे ही सुनियार और लूट जाएंगे !

जब ऐसे ही करती रही समय की सरकारें
महंगाई की चपेट में आकर कई परिवार लूट जाएंगे !
मेंढक यदि खाने लगे कोबरा के सिर को ही
तब घूमने वाली कुर्सी के अधिकार लूट जाएंगे !

क्यों लड़ना मजहब की खातिर जब आपस में एकता नहीं
जो थोड़े बहुत होते सब सत्कार लुट जाएंगे !
बेईमानी जब फैल गई सूर्य की रोशनी जैसे
चंद्र कहलाते खुद को जो इमानदार लुट जाएंगे !

इंसाफ न मिला कोर्ट से कहानियां सब जीवत है
बता दे दिल्ली दर्दी को तेरे कब गुनाहगार लुट जाएंगे !