क्या कहूँ उन #लोगों को, जिन्होंने मेरा #साथ छोड़ दिया,
क्यूँ छोटी सी #बात पर उन्होंने, मेरा #हाथ छोड़ दिया... #ख़्बाहिश थी कि निभाऊँगा उनसे #दोस्ती ता-उम्र,
पर उन्होंने पहली #मुलाकात में ही मेरा #ख़्बाव तोड़ दिया...
कैसे समझाऊँ अपने अब इस #दिल के #तार को,
उन्होंने तो मेरे #दिल का तार ही मरोड़ दिया..
क्या करूँ, कैसे करूँ कुछ #समझ नहीं आता,
मैंने भी अब #किस्मत को अपनी, अपने #हालात पर छोड़ दिया...
कर लिए जतन इतने, अपने आप को बदल के
फिर भी गुज़री #ज़िन्दगी, बस आसुओं में ढल के
यूं ही चलती रही ज़िंदगी ग़मों का कारवां लेकर,
पर न आया कोई रहगुज़र, न देखा साथ चल के
दिखता है दूर से तो लगता है कोई अपना है, मगर
जब गुज़रता है क़रीब से, रह जाते हैं हाथ मल के
जीना था जब अकेले ही तो फिर भीड़ क्यों दे दी,
मिलता है क्या तुझको खुदा, इंसान को यूं छल के
उम्र गुज़र गयी मोहब्बत के बिन जीते जीते,
अब गुजरेंगी सुबहो शाम, सोच कर अफ़साने कल के...
जब गर्दिश के भंवर में फंस जाओ,
तो धैर्य का दामन मत छोड़ो
जब #खुशियों का सहारा मिल जाये,
तो अपनों का दामन मत छोड़ो
चाहे #संकट आये या खुशियाँ बरसें,
पर यारों का दामन मत छोड़ो
जो है #नसीब में वो मिल जाएगा,
पर ईमान का दामन मत छोड़ो...