हमें तो हर कदम पर, ग़मों का ज़हर पीना पड़ा है
जीने की चाहत है मगर, घुट घुट कर जीना पड़ा है
दुनिया से जज़्बा ए मोहब्बत ख़त्म हो रहा है अब,
बोलने का हक़ है मगर, इन होठों को सीना पड़ा है
लोगों को #मोहब्बत नहीं अपनी दौलत पर घमंड है,
मगर हमें तो ख़ुदा के, रहमो करम पर जीना पड़ा है
न निभाया साथ उसने भी जिसको कहा था अपना,
हमें तो अपनी #ज़िन्दगी को, तन्हा ही जीना पड़ा है
उम्र के इस पड़ाव पर भी लगता है डर मुझको यारो,
सताते हैं वो अफ़साने, जिसका किरदार जीना पड़ा है
कैसे जियें, ये दर्दे दिल मुस्कराने नहीं देता,
कोई, ज़ज़्बात ए #मोहब्बत निभाने नहीं देता !
बिछा देता है राह में हज़ार कांटे ये जमाना,
वो कभी भी, खुशियों के पल आने नहीं देता !
पीछे खींचने की फितरत है हर आदमी की,
यहां किसी को भी कोई, आगे जाने नहीं देता !
कैसे लिख सकें हम खुशियों के तराने,
जब #दिल, खुशनुमा अल्फ़ाज़ बनाने नहीं देता !