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Taqdeer mita daali

हमने तो इन हाथों की, हर लकीर मिटा डाली,
अपने ही हाथों से, अपनी तक़दीर मिटा डाली
कभी जलवे हुआ करते थे रंगीन महफ़िलों के,
पर इस वक़्त ने उनकी, हर तस्वीर मिटा डाली
मालूम न था कि आँखों में है ख्वाबों का ज़खीरा,
हमने तो अपनी नींदों की, तासीर मिटा डाली
कभी हम भी पहुँच जाते अपनी मंज़िल पे यारो,
अफसोस कि हमने तो, हर तदबीर मिटा डाली
अब न रहा याद कुछ भी भुला दीं सब कहानियां,
हमने तो खुद के दिल से, हर तहरीर मिटा डाली
अब थक चुके हैं हम तो दर्द सुनाते सुनाते,
हमने तो अपनी जुबां से, हर तक़रीर मिटा डाली

Ek achhe insaan hote

न हिन्दू होते न हम मुसलमान होते
काश हम एक अच्छे से इंसान होते
न आतीं गोलियों की बौछारें कहीं से
न यूं शहीदों के इतने बलिदान होते
न भड़कते नफरतों के शोले दिलों में
न यूं मोहब्बतों के रिश्ते बेजान होते
न होती खड़ी आतंकियों की ये फौजें
न यूं दहशतों से चेहरे हलकान होते
न रहता दुश्मनी का जज़्बा किसी में
न यूं ही दोस्ती के रिश्ते बदनाम होते
न सियासत में होती फरेबों की चाशनी
न "मिश्र" जालों में फंस के हैरान होते

Chahat Ko Na Pa Sake

यारो चाहत थी जिसकी, न पा सके हम
खोल के #दिल अपना, न दिखा सके हम

खूब देखी क़रीब से ये मतलबी दुनिया,
किसी को भी अपना, न बना सके हम

आता है रहम खुद पर ही हमको यारो,
कोई भी ख़्वाब अपना, न सजा सके हम

बनाते रहे डगर बस औरों के वास्ते ही,
मगर मुक़ाम अपना ही, न पा सके हम

ये फौलाद का होता तो बात अलग थी,
पर नाजुक से दिल को, न मना सके हम

उम्र का तकाज़ा है या कुछ और है "मिश्र".
अपनों की दी चोट को, न भुला सके हम

Zurm Dil Lagane Ka

कहाँ से सीखें हुनर उसे मनाने का,,,
कोई जवाज़ न था उसके रूठ जाने का...

हर बात में सजा भी मुझे ही मिलनी थी,,,
जुर्म मैंने किया था उनसे #दिल लगाने का

Khuda Mehfuj Rakhe

ख़ुदा महफूज़ रखे,
आपको तीनों बलाओं से,,,

वकीलों से, हक़ीमों से,
और हसीनों की निगाहों से !!!