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Zinda Rahe To

गर ज़िंदा रहे यारो, तो कल की सहर देखेंगे
रस्ते से हटे कांटे, तो अपनी भी डगर देखेंगे

डर डर के जी रहे हैं बंद कमरों में आजकल,
गर बदलेगा समां, तो आगे का सफ़र देखेंगे

जाने आ जाएँ कब गिरफ़्त में करोना की हम,
बच गए तो मेहरवानी, वरना तो कहर देखेंगे

बढ़ रहीं शमशान में धुएं की लकीरें रोज़ ही,
अब तो भरोसा है खुदा पे, उसकी मेहर देखेंगे

कसम खालो कि न छुएंगे अपने या पराये को,
वर्ना तो लोग जल्दी ही, मरने की खबर देखेंगे

जो चले थे कभी साथ साथ ज़िंदगी की राहों में
अबतो दूर से ही सबकेसब अंतिम सफऱ देखेंगे

होश में आओ ज़रा सा अभी भी वक़्त है 'मिश्र',
वरना तो तेरे अपने भी, बस इधर उधर देखेंगे...

Bin Pankho Ke Udna

हम पक्षी तो नहीं, के हमारे पंख हो
फिलाल भटका हुआ हूँ
जिसका कोई पथ हो
वो इंसान बनना चाहता हूँ
मैं बिन पंखो के, उड़ना चाहता हूँ

छू लू आज मैं, इस ऊँचे आसमान को
पर रास्ता तो मिले
मेरे करवान को
इसे नापना चाहता हूँ
मैं बिन पंखो के, उड़ना चाहता हूँ

छू कर बादलों को, महसूस इन्हे कर लु
बैठ कर ज़रा पास
दो बातें इनसे कर लु
दिल हल्का करना चाहता हूँ
मैं बिन पंखो के, उड़ना चाहता हूँ

Foolon Ki Daastan

मैं फूलों की दास्ताँ, काँटों की जुबानी लिखता हूँ
ख़िज़ाँ की जुबाँ से, गुलशन की कहानी लिखता हूँ

तितलियों के मन में क्या है, भला हमको क्या पता
मैं तो थिरकनें उनकी, रंगों की जुबानी लिखता हूँ

डालियों में है कितना दम, ये तो दरख़्त जानता है
मैं पत्तों का छटपटाना, हवा की जुबानी लिखता हूँ

भले ही खुशबुओं से तर है, उपवन का हर कोना,
मैं परागों की कहानी, भोंरों की जुबानी लिखता हूँ

है बागों की बहारों से, मेरा पुराना सा रिश्ता यारो
मैं कोकिल की कूँज से, बागों की रवानी लिखता हूँ

होंगे बहुत खुश, पखेरुओं को बसेरा दे कर विटप
मैं तो खगों की दास्ताँ, नीड़ों की जुबानी लिखता हूँ

"मिश्र" होता है बहुत खुश, चमन को देख के बागवां,
मैं उसका खाद पानी, फ़िज़ाँ की जुबानी लिखता हूँ

Corona ne wafadar bana diya

यारो कोरोना ने सब को, वफ़ादार बना दिया
रिश्तों की भारी घुटन को, हवादार बना दिया

कुछ दिन तो याद आया ऑफिस भी ज़रूर,
पर इस आफ़त ने फिर से, घरवार बना दिया

छोड़ दी दोस्ती यारी मगर फोन का क्या करें,
हमें अपनों ने पूंछ पूंछ कर, बीमार बना दिया

जाने किसने उड़ा दिया कि नासाज़ है तबियत,
अपनों ने झूठी खबर को, अखबार बना दिया

यारो सच तो ये है कि होते हैं अपने, अपने ही,
फिर से गुज़रे फ़सानों को, नमूदार बना दिया

नंगी तलवार तो टंगी है हर किसी के सर पर,
मगर सब को ही साहस का, सरदार बना दिया

आयी है आफ़त तो एक दिन जाएगी भी"मिश्र",
मगर कुदरत ने सब को, ख़बरदार बना दिया

Majboori par hansa mat karo

किसी की मजबूरियों पर, हंसा मत करिये
यूं बेसबब झूठे गरूर का, नशा मत करिये

कुछ भी पता नहीं इस वक़्त की नज़रों का,
खुद को ख़ुदा समझने की, खता मत करिये

बदवक़्त कभी कह कर नहीं आता है दोस्त,
कभी खुद के बुने जालों में, फंसा मत करिये

जिसने बिठाया था जमीं से फलक पर तुम्हें,
उन्हें बन के कभी विषधर, डसा मर करिये

ज़रुरत है उल्फत की जिस बीमार दिल को,
कभी नफ़रतों से उसकी, शिफ़ा मत करिये

अजब सी दुनिया में अजब से रिश्ते हैं "मिश्र",
कभी अपनों की बात पर, गिला मत करिये