मैं तो जमीं तो जमीं, आसमाँ छोड़ आया,
जाने कितने दिलों की, दास्तां छोड़ आया !
मैं यादों के झरोखों से देखता हूँ अब भी,
कि बदन साथ था, पर आत्मा छोड़ आया !
किस से कहूँ मैं अपना दर्दे दिल आखिर,
मैं तो मोहब्बत का, वो नगमा छोड़ आया !
अज़ब से रंग देखे थे अपनों के परायों के,
मैं तो सारा का सारा, वो समां छोड़ आया !
मैंने भी गाये थे वो तराने उल्फत के दोस्त,
जाने जीने की वो सरगम, कहाँ छोड़ आया !!!
बिठा दें चाहे लाख पहरे, ये जमाने वाले,
मगर घुस ही जाते हैं, दिल जलाने वाले !
कर सकते हैं राख उनको भी ये शोले,
भला कहाँ सोचते हैं ये, घर जलाने वाले !
अब तो मदद करना भी गुनाह है दोस्तो,
नहीं हैं कम इधर, इलज़ाम लगाने वाले !
बड़ा बेरहम है आज का ये जमाना दोस्त,
लापता हो जाएंगे, तुझ पे जाँ लुटाने वाले !
कहाँ फंस गए ठगों की नगरी में हमतो,
न मिलेंगे ढूंढें से अब, दोस्ती निभाने वाले !
सजा कैसी मिली मुझको तुमसे दिल लगाने की,
रोना ही पड़ा है जब कोशिश की मुस्कुराने की
कौन बनेगा यहाँ मेरी दर्द भरी रातों का हमराज,
दर्द ही मिला जो तुमने कोशिश की आजमाने की