आदमी के तजुर्बों की, एक किताब है ज़िन्दगी,
उसकी ख़ुशी और ग़मों का, हिसाब है ज़िन्दगी !
झूलता रहता है आदमी आशा निराशा के बीच,
सपनों व चाहतों का, भयंकर जंजाल है ज़िन्दगी !
ज़रूरतों ने बना डाला घन चक्कर आदमी को,
उसकी खामखयाली का, एक जवाब है ज़िन्दगी !
जो जानते हैं जीना जी लेते हैं इस दुनिया में वो,
वर्ना तो समझ लो कि, खाना खराब है ज़िन्दगी !
कुछ अलग से, काम करने की आदत है हमें,
हर ज़ुल्म को, हंस के सहने की आदत है हमें !
नहीं सोचते नफ़ा नुक्सान की बात हम कभी
क्योंकि अपनों के लिए, मरने की आदत है हमें !
लग जाता है लोगों को कुछ बुरा तो लगा करे,
पर अफ़सोस कि, खरी कहने की आदत है हमें !
रोज़ निकलते हैं मंज़िले मक़सूद की तलाश में,
मगर क्या करें, यूं राह भटकने की आदत है हमें !
भले ही बरसती हों हमारी आँखें अकेले में,
पर अपने ग़म को, छुपा रखने की आदत है हमें !