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Musafir sab kuch bhool gya

अपनी धुन में मस्त मुसाफिर, बीता रास्ता भूल गया
क्या छोडा किसको छोडा, सब अपना पराया भूल गया
दुनिया का चलन ही ऐसा है उसका कोई दोष नहीं,
आगे बढने की चाहत में, वो गुज़रा जमाना भूल गया
कैसे लोग थे कैसी बातें कैसी थी लोगों की घातें,
कैसा था मंज़र गालियों का, वचपन के सपने भूल गया
कभी कोंधती होगी बिजली मन में उसकी यादों की,
धुंधला अक्श उभरता होगा, पर लोगों के चेहरे भूल गया
जिन राहों ने मंज़िल बख्सी उनका खयाल नहीं रखा,
उसने तो बस आगे देखा, वो पीछे की कहानी भूल गया

Sach batata hai Aaina

दोस्ती या दुश्मनी, नहीं निभाता है आईना
जो उसके सामने है, वही दिखाता है आईना
सामने ला देता है सच जो नहीं दिखता हमें,
अच्छा या बुरा, कुछ नहीं छिपाता है आईना
चुपके से पोंछ डालो गर्द चेहरे की "मिश्र",
किसी के दाग, किसी को नहीं बताता है आईना

Aag lagi hai hawaon mein

क्यों लगी है आग सी आज इन हवाओं में
जल रहा है तन बदन आज इन फिज़ाओं में
दिल्लगी को प्यार समझ बैठे हम उनका
फस गया बेचारा दिल उनकी हसीं अदाओं में
रहेंगे पास तो सतायेगी याद उनकी
अब छोड़ देंगे शहर हम उनकी दी सजाओं में

Zindagi ki sham ho gayi

आधी उम्र तो, ख्वाहिशों के नाम हो गयी
जो बची थी वो, नफरतों के नाम हो गयी
मोहब्बतों के लिये वक़्त ही न बचा अब,
देखते ही देखते, ये ज़िंदगी तमाम हो गयी
जीते रहे सिर्फ शोहरतों के लिये हम, मगर,
फरेबी दुनिया में, ज़िंदगी बदनाम हो गयी
वक़्त सरक गया हाथों से रेत की तरह "मिश्र",
होश आया जब तक, ज़िंदगी की शाम हो गयी

Zindagi ke khel ajeeb hain

ये ज़िंदगी के खेल भी कित्‌ने अजीब होते हैं
सच्चाई की राह में हमेशा काँटे नसीब होते हैं
नहीं चाहता कोई अपनों से दूर होना “मिश्र”
पर देते हैं वही धोखे जो दिल के करीब होते हैं