ज़रा सी है ये ज़िन्दगी, तक़रार क्या करना !
जब रहना है साथ साथ, तो रार क्या करना !
दुखित है वैसे भी मन, तमाशे देख दुनिया के,
फिर भरे बाज़ार में, तमाशा यार क्या करना !
काट लो खुशियों से, बची है जो ज़िंदगी यारो,
इसके लिए भी यूँही, नख़रे हज़ार क्या करना !
झेली हैं हमने मुश्किलें, वह अपना करम था ,
अपने लिए किसी और को, लाचार क्या करना !
न जीत पाया कोई भी, इन नफरतों के खेल में,
ज़िंदगी के सफर में, किसी पे वार क्या करना !
ज़िंदगी तो बेसुरा, एक राग बन गयी,
जीने की तमन्ना, अब राख बन गयी !
हम हम न रहे तुम तुम न रहे दोस्त,
वो अधूरी दास्तां, बस याद बन गयी ! #मोहब्बत के चराग बुझ चुके कब के,
वो चाहत अंधेरों की, सौगात बन गयी !
न आएँगी बहारें अब लौट कर कभी,
ज़िन्दगी सूखा हुआ सा, पात बन गयी !
मांगेंगे लोग तो क्या जवाब दोगे दोस्त,
क्यों अच्छी भली बात, बेबात बन गयी !!!
राख हूँ मैं बेशक मगर, फ़ितरत अभी बाक़ी है,
दिखा सकता हूँ जलवे, हिम्मत अभी बाक़ी है!
न समझो कि मैं डर गया दुनिया के अंधेरों से,
यारो चराग़ों के बुझने में, वक़्त अभी बाक़ी है!
न करना किसी से ज़िक्र मेरे बिगड़े हालात का,
दुनिया की नज़र में मेरी, इज़्ज़त अभी बाक़ी है !
न बदली है न बदलूंगा मैं अपनी फ़ितरत यारो,
मेरे दिल के हर कोने में, मोहब्बत अभी बाक़ी है !
सिरफिरा हूँ दोस्तो कि ढूढ़ता हूँ पत्थरों में जान,
उन्हें भी दोस्त बनाने की, हसरत अभी बाक़ी है !!!
ख़ुशी न दे सको,तो रुलाओ मत यारो,
गुनाहों को अपने, छुपाओ मत यारो !
ये जो दुनिया है सब जानती है दोस्त,
उसे झूठी कहानी, सुनाओ मत यारो !
देख लो झाँक कर अपना गिरेवां भी,
मुजरिम औरों को, बनाओ मत यारो !
गुनाहों की सजा तो मिल कर रहेगी,
इसे कोई साजिश, बताओ मत यारो !
न देखा चल के कभी सीधी डगर पर,
फिर राहों को दोषी, बताओ मत यारो !
ये दौलत का नशा मुबारक़ हो दोस्त,
पर गरीबों पे रुतबा,जमाओ मत यारो !
आदमी से क्या क्या, न करा देता है ख़ुदा,
इंसान को खुला बाज़ार, बना देता है ख़ुदा !
उसे सब कुछ ही बटोरने की चाहत दे कर,
बेचारे इंसान को हैवान, बना देता है ख़ुदा !
कोई तो ओढ़ता है बिछाता है दौलत को,
तो किसी को भिखारी, बना देता है ख़ुदा !
ईमान ओ धरम तो ले लिए वापस उसने,
अब लम्पटों को नायक, बना देता है ख़ुदा !
सिक्के का एक ही पहलू न देखिये ,
कभी कभी बिगड़ी बात, बना देता है ख़ुदा !!