कितने मतलबी हैं हम, कि अपना ही घर देखते हैं !
गर जलता है घर किसी का, तो अपने हाथ सेकते हैं !
कितने छलों प्रपंचों से भरे हैं इस दुनिया के लोग,
कि #खून के रिश्तों में भी, परायों सा अक्स देखते हैं !
हम हैं कि क्या क्या सोचते हैं गलत औरों के फेर में,
अफसोस कि खुद को भी, औरों की नज़र से देखते हैं !
गीता का ज्ञान भी उल्टा हो गया है आजकल दोस्तो,
लोगों के शरीर ज़िंदा हैं मगर, #आत्मा मरी देखते हैं !
मिट गए न जाने कितने #ख़ुदा की तलाश में,
मगर अब तो हर तरफ हम, ख़ुदा ही ख़ुदा देखते हैं !
Rehte Ho Aaj Bhi Sanson Mein Tum,
Yaadon Mein Tum Kitabon Mein Tum,
Jab Bhi Kalam Uthata Hun Likhne Ke Liye,
Ban Kar Ghazal Aa Jate Ho Lafzon Mein Tum!
Rehte Ho Aaj Bhi Sanson Mein Tum,
Yaadon Mein Tum Kitabon Mein Tum,
Jab Bhi Kalam Uthata Hun Likhne Ke Liye,
Ban Kar Ghazal Aa Jate Ho Lafzon Mein Tum!
देखते ही देखते, सितारे बदल जाते हैं !
हाथ में आकर, किनारे फिसल जाते हैं !
दोस्तो उलझनों का सागर है ज़िंदगी,
इसके, साँझ और सकारे बदल जाते हैं !
रफ़्ता रफ़्ता खिसकती है ये #ज़िंदगी,
देखते ही देखते, नज़ारे बदल जाते हैं !
बहुत मतलबी हो गया है ये जमाना,
देखते ही देखते अब, नारे बदल जाते हैं !
कोई खुश भी रहे तो कैसे रहे ?
जाने क्यों वक़्त के, इशारे बदल जाते हैं
बड़ा ज़ुर्म करता हूँ कि, मैं ख्वाब देखता हूँ !
दिल के टूटे टुकड़ों का, मैं हिसाब देखता हूँ !
ये बेरहम दुनिया के बेरहम लोग हैं यारो ,
उनके कारनामों की, मैं किताब देखता हूँ !
गुनाह है गर ज़िंदगी तो क्यों न मार डालो,
वैसे भी क़ातिलों का, मैं इंतज़ार देखता हूँ !
कौन सा ज़िंदा हूँ मैं जो मरने से डर जाऊं ,
रोज़ ही हर मोड़ पे, मैं ज़हरे अज़ाब देखता हूँ !
कौन जी पाता है आज अपने मुताबिक,
हर चेहरे पर अज़ीब सा, मैं तनाव देखता हूँ !