#धीरज से संभालिये, तो गुत्थी खुद सुलझ जायेगी,
वरना तो हड़बड़ी में ये, और ज्यादा उलझ जायेगी !
भरोसे की नींव पर टिकी होती है #रिश्ते की दीवार,
अगर खिसकेगी इक ईंट भी, फिर न संभल पायेगी !
ग़लतफ़हमियों को ज़िगर में सजाना छोड़ दो यारो,
वर्ना ग़मों से लवरेज़ उम्र, बस यूं ही निकल जाएगी !
बिखरते देखे हैं कितने ही #रिश्ते मैंने इसी सबब से,
न समझोगे बात इतनी, तो हाथों से फिसल जाएगी !
बेहतर है कि मिल बैठ कर सुलझा लो शिकवे,
वरना तो वर्षों की #मोहब्बत, नफ़रत में बदल जाएगी !
दिल खोल के रख देना, ये फितरत है हमारी,
न आये गम कभी अपनों पे, हसरत है हमारी
किसी का उदास होना देखा नहीं जाता हमसे,
ख़ुदा मेहर करे उन पर, यही इबादत है हमारी
उनसे क्या कहें भला जो हैं गुलाम नफ़रत के,
पर न करना किसी से दुश्मनी, आदत है हमारी #मोहब्बत ही काफी है मुश्किलों के हल के लिए,
मगर खलल जो डालती है, वो नफ़रत है हमारी
पूंछा विधाता से कि क्यों बना दीं बुराइयां उसने,
बोले, अरे ये दुनिया चलाने की, हिक़मत है हमारी
इस #दिल में, मोहब्बत की शमा जलती रही ,
यादों का बोझ लिए, ये ज़िन्दगी चलती रही !
आता रहा जलजला ज़माने भर का लेकिन,
बस टकराते रहे उस से, और उम्र ढलती रही !
उम्र भर सताता रहा फरेबियों का काफ़िला,
पर ख़ुदा के फज़ल से, जान बस बचती रही !
गर्दिशे दौरां में न पकड़ा बाजू किसी ने मगर,
दरिया ए ग़म से, ज़िंदगी बस निकलती रही !
यही है फ़साना तमाम #ज़िन्दगी का,
कभी ये ऊपर चढ़ी, तो कभी बस गिरती रही !
लेते हैं हर चीज़ मेरी, अपना सामान समझ कर,
जब मांगते हैं हम, तो देते है अहसान समझ कर !
गैरों से बात करते हैं जैसे कि वो अपने हैं उनके,
पर हमसे पेश आते हैं वो, पराया इंसान समझ कर !
छुपा रखा है उनको #ज़िन्दगी समझ कर दिल में,
मगर पेश आते हैं हमसे वो, अनजान समझ कर !
हमें #मोहब्बत है उनसे जानते हैं बदस्तूर वो मगर,
उड़ा देते हैं जज़्बात मेरे, वो एक नादान समझ कर !
कर दी निसार उन पर ज़िन्दगी की हर ख़ुशी,
पर भूल गया हमें वो, खोया हुआ ईमान समझ कर !
कभी ख़ारों, तो कभी फूलों की तरह दिखता है आदमी !
कभी अंधेरों, कभी उजालों की तरह दिखता है आदमी !
कभी दिखता है पत्थर #दिल कभी शराफत का पुतला,
तो कभी उलझे हुए, सवालों की तरह दिखता है आदमी !
कभी दिखता है #दुश्मन तो कभी नज़र आता है दोस्त,
तो कभी बिगड़ी हुई, रवायतों की तरह दिखता है आदमी !
कभी तो दिखता है उछलता डूबता सोचों के सागर में,
तो कभी छलकते हुए, जामों की तरह दिखता है आदमी !
कभी तो दिखता है वो खूंखार क़ातिल की तरह,
तो कभी ज़ख्मों पर, मरहमों की तरह दिखता है आदमी !