शोहरत के साथ रिश्ते भी, अजीब सा अहसास कराते हैं
जिनकी सूरत भी याद नहीं, हमें दिल के पास बताते हैं
जो मुफलिसी में छुपाते थे हमसे अपना रिश्ता यारो,
आज वही दुनिया के सामने, हमें अपना ख़ास बताते हैं
कैसी है ये दुनिया जहां आदमी की कोई क़द्र नहीं "मिश्र",
दौलत है तो सब तुम्हारे, वरना तो सब उपहास उड़ाते हैं...
कभी फुर्सत में ज़रा, हमें भी याद किया होता
दिन में वक़्त नहीं, ख़्वाबों में याद किया होता
बहुत गुज़रते होंगे तुम्हारे दर से हो कर लोग,
कभी तो किसी के ज़रिये, सम्बाद किया होता
अब तो मुद्दत गुज़र गयी तेरे दीदार के बिना,
कभी तो आकर ये घर मेरा, आबाद किया होता
ज़िंदगी छोटी है कल न जाने क्या हो क्या पता,
मेरी खातिर तुमने, इक पल तो बर्बाद किया होता...