आदमी के तजुर्बों की, एक किताब है ज़िन्दगी,
उसकी ख़ुशी और ग़मों का, हिसाब है ज़िन्दगी !
झूलता रहता है आदमी आशा निराशा के बीच,
सपनों व चाहतों का, भयंकर जंजाल है ज़िन्दगी !
ज़रूरतों ने बना डाला घन चक्कर आदमी को,
उसकी खामखयाली का, एक जवाब है ज़िन्दगी !
जो जानते हैं जीना जी लेते हैं इस दुनिया में वो,
वर्ना तो समझ लो कि, खाना खराब है ज़िन्दगी !
कुछ अलग से, काम करने की आदत है हमें,
हर ज़ुल्म को, हंस के सहने की आदत है हमें !
नहीं सोचते नफ़ा नुक्सान की बात हम कभी
क्योंकि अपनों के लिए, मरने की आदत है हमें !
लग जाता है लोगों को कुछ बुरा तो लगा करे,
पर अफ़सोस कि, खरी कहने की आदत है हमें !
रोज़ निकलते हैं मंज़िले मक़सूद की तलाश में,
मगर क्या करें, यूं राह भटकने की आदत है हमें !
भले ही बरसती हों हमारी आँखें अकेले में,
पर अपने ग़म को, छुपा रखने की आदत है हमें !
कभी इधर ढूंढ़ता हूँ, तो कभी उधर ढूंढ़ता हूँ,
दिल की हर धड़कन, और कोनों में ढूंढता हूँ
न मिला मुझे बीते कल का कोई भी लम्हां,
मैं कोई अतीत का, प्यारा सा अक्स ढूंढ़ता हूँ
मैं भूल गया रख कर कहीं यादों की पोटली,
मैं अपने बचपन के, खेलों का आँगन ढूंढता हूँ
ऊब सा गया हूँ मैं ये कौन सी उम्र है ,
कि मैं खुद में क्यों, जवानी की धमक ढूंढ़ता हूँ...