बा -मुश्किल मिली है आज़ादी, ज़रा संभल के रहिये
पहना दे बेड़िया फिर से न कोई, ज़रा संभल के रहिये
ज़र्रे ज़र्रे में मिला है खून शहीदों का वतन वालो,
ऐसी ज़मीने हिंद को न घूरे कोई, ज़रा संभल के रहिये
खिसका देते हैं पडोसी कुछ नाग हमारे घर में भी
हमें फन उनका भी कुचलना है, ज़रा संभल कर रहिये
डटे हैं जांबाज़ सीमा पर आँखें लगाये दुश्मनों पर
घर के अंदर भी हैं दुश्मन हमारे, ज़रा संभल कर रहिये
लहराता रहे तिरंगा अज़ीमो शान से हर तरफ
उठे न कोई बदनज़र उस पर कभी, ज़रा संभल कर रहिये
ये दबदबा ये हुक़ूमत का मज़ा, हमेशा नहीं रहा करता
ये दौलतों ये शोहरतों का नशा, हमेशा नहीं रहा करता
कोई नहीं जानता ख़ुदा के इशारों को दोस्तो,
यहाँ अंधेरों व उजालों का समां, हमेशा नहीं रहा करता
आज आँखों से आँखें, नहीं मिलाता कोई
आज #दिल से भी दिल, नहीं मिलाता कोई
नज़र आता है हर कोई खोया हुआ सा,
अब महफ़िल में जलवे, नहीं दिखाता कोई
भागता फिरता है न जाने क्या पाने को,
अब अपनों में चंद लम्हें, नहीं बिताता कोई
खोजता फिरता है वो जीने के साधन नए,
मगर अपने लिए कुछ भी, नहीं बनाता कोई
ये ख्वाहिशें ये सामान किस के लिए है,
सब कुछ यहीं का है, साथ नहीं ले जाता कोई...