जो दब चुके हैं राख में, उन शोलों को मत कुरेदिए !
जो भर चुके हैं जैसे तैसे, उन घावों को मत कुरेदिए !
बदल देते हैं खेल सारा वो अतीत के नापाक मंजर,
अब गुज़र चुके जो पीछे, उन लम्हों को मत कुरेदिए !
अतीत के गुलशन से बस चुनिए तो फूल खुशियों के,
भाई आये हो छोड़ पाछे, उन ख़ारों को मत कुरेदिए !
इन लफ़्ज़ों की मार से मैंने देखे है कितने ही घायल,
अरे जो बसा रखे है दिल में, उन भावों को मत कुरेदिए !
यहां पे हर किसी को हक़ है अपनी ज़िन्दगी जीने का,
फिर मज़हब के नाम पे, उनके मनों को मत कुरेदिए !
ये जमाना तो सब्र कर लेता है हर तरह से ही "मिश्र",
यूं सियासत के नाम पे, उसके जज़्बों को मत कुरेदिए !
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अब किसी के दुःख में, भला कोंन मरा करता है,
अब किसी के हक़ में, भला कोंन दुआ करता है !
सभी तो दिखते हैं मगन अपने ख़्वाबों ख़यालों में,
जफ़ाओं की दुनिया में, भला कोंन वफ़ा करता है !
इक उम्र गुज़र जाती है अपना आशियाँ बनाने में,
कर देते हैं खाक पल में, भला कोंन दया करता है !
क्यों है वो इतना खुश हमें तो ग़म है सिर्फ इसका,
शामिल किसी के ग़म में, भला कोंन हुआ करता है !
अब तलाशते हैं "मिश्र" सब मंज़िलें अपनी अपनी,
यूं मेहरवाँ किसी और पे, भला कोंन हुआ करता है !
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क्यों कर न जाने दिल के, ये तराने बदल गए
जो साधे थे कभी हमने, वो निशाने बदल गए
हम तो ढोते रहे बस यूं ही #ज़िन्दगी को यारो,
हमारा वक़्त क्या बदला, कि जमाने बदल गए
गैरों की बात छोडो अपने न रहे साथ अब तो,
मतलब के हिसाब से, उनके बहाने बदल गए
जो कल तक निवास करते थे हमारे दिल में,
मौसम के हिसाब से, उनके ठिकाने बदल गए
हम कहाँ तक संभालें ये जज़्बात अपने,
इस कदर बदला समां, कि फसाने बदल गए...
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मत समझो पत्थरों की दुनिया को सब कुछ,
गर तुमको देखनी है ज़िंदगी, तो गाँव चलिए !
मिटा डाला है जो क़ुदरत का सामान तुमने,
गर तुमको देखना है फिर से, तो गाँव चलिए !
तुम्हें कैसे रास आती हैं ये शहर की हवाएं,
गर सांस लेना है तुम्हें चैन की, तो गाँव चलिए !
क्यों घुमते फिरते हो तुम न जाने कहाँ कहाँ,
है देखना कुदरत का खज़ाना, तो गाँव चलिए !
न जानता है कोई इधर कि कोंन है पड़ोस में,
अगर देखने हैं दिलों के रिश्ते, तो गाँव चलिए !
सूरज की रौशनी भी न देख पाते कुछ लोग तो,
गर देखना है ऊषा का आँचल, तो गाँव चलिए !
यूं किस तरह से जीते हो इस शोरगुल में यारो,
गर सुननी है कूक कोकिल की, तो गाँव चलिए !
मिटा डाली है गरिमा ही तुमने हर त्यौहार की
गर तुमको देखने हैं ढंग असली, तो गाँव चलिए !
सोने चांदी से पेट भरता नहीं किसी का भी "मिश्र",
गर तुमको देखना है अन्नदाता, तो गाँव चलिए !
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Darte hain apse bewafai karne se,
Koi mujse kabhi insaf na krega...
Is dunia se #Bewafai ki to chlega
Lekin Apse kabhi ki to ,
Khuda bhi mujhe maaf na krega...
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