ख़ुद ही काँटों भरे ये रास्ते, हम बनाते क्यों हैं,
यारो पत्थर दिलों से रिश्ते, हम निभाते क्यों हैं !
जब जानते हैं दुनिया की बेरुख़ी का आलम,
तो औरों को खुद उजड़ के, हम बसाते क्यों हैं !
न समझता है कोई भी औरों की मुश्किल यारो,
तो #दिल में औरों के दर्दो ग़म, हम बिठाते क्यों हैं !
ज़रा सी बात पर कभी अपने पराये नहीं हो जाते,
फिर दुश्मनों से दिल आखिर, हम लगाते क्यों हैं !
जो खड़ा था कभी साथ साथ हर कदम पे "मिश्र",
सबसे ज्यादा ही दिल उसका, हम दुखाते क्यों हैं !
भला मुर्दों के शहर में, ज़िन्दगी का असर क्या होगा,
बनावट के इन मेलों में, सादगी का असर क्या होगा !
जिसने न कभी समझी, रहमो करम की भाषा यारो,
उन पत्थर दिलों में कभी, बंदगी का असर क्या होगा !
जो जलते ही रहते हैं रात दिन, नफरतों की आग में,
मैले दिलों में उनके, आशिक़ी का असर क्या होगा !
जिन्हें होता है नशा सिर्फ, अपनों का लहू पी कर ही,
ऐसी शैतान खोपड़ी में, मयकशी का असर क्या होगा !
टपकते हैं जुबाँ से जिनकी, ज़हरों से भरे अलफ़ाज़,
उनकी कडुवी जुबान पे, चाशनी का असर क्या होगा !!!