किसी के वर्षों से टिके रिश्तों को, अहम् खा गया,
तो किसी को अपनी सौहरत का, टशन खा गया !
न कोई भी तैयार है झुकने को अपनी गलती पे,
बस हर किसी को ख़ुदा होने का, भरम खा गया !
अब बहाते हैं अपनी बर्बादियों पर वो आंसू मगर,
सच तो ये है कि उनको उनका ही, करम खा गया !
बो दिए हैं विष बीज इस क़दर आदमी ने यारो,
कि चमन की फ़िज़ाओं को, उल्टा चमन खा गया !
जो कभी दुश्मन थे, अब वो उनके यार हो गए,
हर मुश्किल में दिया साथ, हम बेकार हो गए !
कभी खाते थे वो कसमें हमारे नाम की दोस्तो,
मगर उनके लिए अब हम, गुज़री बहार हो गए !
कभी होती थी गुफ़्तगू हमारे अंदाज़ की दोस्तो,
हम वही हैं मगर, उनके लिए अब गंवार हो गए !
मतलब से बनते बिगड़ते हैं ये रिश्ते अब ज़नाब,
अब रिश्ते भला रिश्ते कहाँ, बस व्यापार हो गए !
मुकद्दर भी कैसे बदलता है अपनी करवटें दोस्त,
कि कल तक थे मददगार, अब गुनहगार हो गए !
मेरी चुप को, मेरी कमज़ोरी मत समझ लेना,
तुम अपने खयालात को, सच मत समझ लेना !
मैं सुनता हूं सभी की बात को दिल लगा कर,
जवाब न देपाना, मेरी मज़बूरी मत समझ लेना !
ये तो मेरी शराफत है कि सहता हूँ हर सितम,
मेरी इस आदत से, मुझे कायर मत समझ लेना !
मेरा तो ये उसूल है कि बात की जड़ समझूँ,
मेरे खयालात पर, मुझे पागल मत समझ लेना !
सिर्फ बातों के युद्ध में देखी हैं बर्बादियाँ मैंने,
मेरी इस बात को यारो, बे बात मत समझ लेना !
शब्दों की चोट तन पै नहीं दिल पै घाव करती है,
इस फ़लसफे को, कोरी बकबास मत समझ लेना !
जो चलाते हैं खंज़र, भला उनका क्या जाता है ,
देख कर दर्द औरों का, उनको तो मज़ा आता है !
नहीं ढूढता हल कोई किसी की मुश्किलों का,
इस शहर में लोगों को, बस खेल करना आता है !
नफरतें, हिकारतें जम चुकी हैं दिलों में अब तो,
बस ज़रा सी बात पर ही, बवाल करना आता है !
बेग़ैरती तो बन चुकी है ज़िन्दगी का एक हिस्सा,
इसी के चलते लोगों को, कमाल करना आता है !
दौलत के नशे में कुछ भी कर गुज़रता है आदमी,
इसी के बल पे उसे, सच को झूठ करना आता है !