यूं ही बिना मतलब के, वो बात बोल देते हैं
खुद ब खुद अपना ही, वो राज़ खोल देते हैं
समझते हैं वो खुद को चालाक कुछ ज्यादा,
और खुशनुमा माहौल में, वो रार घोल देते हैं
न तो शब्द की पहचान न तासीर से मतलब,
आया जुबाँ पे जो भी, वो अल्फ़ाज़ बोल देते हैं
कोई मतलब नहीं किसी के लिहाज़ का उन्हें,
सभी के समक्ष अपनी, वो औकात खोल देते हैं
रिश्तों की अहमियत भला वो क्या जाने,
खुद ही मीठे रिश्तों में, जो खटास घोल देते हैं
मुझको बेसबब, सर झुकाना बुरा लगता है
यूं ही मकर से, आंसू बहाना बुरा लगता है
जो दिल और चेहरे को रखते हैं अलहदा,
ऐसे शातिरों से, दिल लगाना बुरा लगता है
अपने बूते पे गुमाँ है तो करिये फतह मगर,
किसी की, बेबसी को भुनाना बुरा लगता है
उड़िये, किसने रोका है तुम्हारी परवाज़ को,
मगर किसी को, नीचे गिराना बुरा लगता है
जीता है हर आदमी अपनी तरह से "मिश्र",
मगर खुद को, ऊंचा दिखाना बुरा लगता है
अपनी जुबाँ की तासीर को, ज़रा समझ कर देखो
कैसे करती है घाव गहरे ये, ज़रा समझ कर देखो
तलवार का घाव तो, भर जाता है एक दिन,दोस्त
पर ना भरते है ज़ख्म इसके, ज़रा समझ कर देखो
इन आँखों से देखी हैं, कितनी ही तबाहियाँ हमने,
कैसे बिगड़ते हैं ये नाते रिश्ते, ज़रा समझ कर देखो
इस जुबाँ के दम पे ही, बनते हैं दुनिया के काम सारे,
क्यों कर बिगड़ते हैं इसी से, ज़रा समझ कर देखो
ज़रा सा ही चुप, हरा देता है हज़ार बातों को "मिश्र",
फिर बदलती है फिजां कैसे, ज़रा समझ कर देखो