दूर से तो हर चेहरा, सुन्दर नज़र आता है,
क़रीब से खोटों का, समंदर नज़र आता है !
बनायें तो कैसे बनायें शीशे का ताज महल,
इधर तो हर हाथ में ही, पत्थर नज़र आता है !
ये सफ़र #ज़िन्दगी का इतना भी नहीं आसां,
हर कदम पर इसके, वबंडर नज़र आता है !
चेहरों का नूर भी अब दिखावा सा लगता है,
यारो असली तमाशा तो, अंदर नज़र आता है !
किस तरह बदली है ज़माने की फ़िज़ां दोस्तो,
इधर तो हर आदमी, कलंदर नज़र आता है !!!
हम ज़फाओं में बस उसकी, वफ़ा खोजते रहे,
हम तो शोलों में शबनम का, मज़ा खोजते रहे !
लोग पी कर भूल जाते हैं, अपना भी घर मगर,
हम तो नशे में भी उसका ही, पता खोजते रहे !
न छोड़ा कोई भी दाव उसने, गिराने का हमको,
मगर हम तो उसकी चालों में, अदा खोजते रहे !
इस कदर बदल जाने का, न मिला सबब हमको,
मगर रात दिन हम तो अपनी, ख़ता खोजते रहे !
निकाल फेंका दिल से हमें, कूड़ा समझ के,
पर हम थे कि उसमें भी यारो, नफ़ा खोजते रहे !
ख़ुदाया वो भी हमारी, ज़िन्दगी हुआ करते थे ,
उनके लिए यारो हम, दिन रात दुआ करते थे !
उजाला उनकी यादों का हम बसा के दिल में,
रातों की महफ़िलों में, हम तन्हा रहा करते थे !
न रहा वो मौसम और न रहा वो ज़माना अब,
चोट खाकर भी चेहरे पे, मुस्कान रखा करते थे !
देखे थे अनेकों दौर मुश्किल के हमने भले ही,
पर #ज़िन्दगी की राहों पर, बावफ़ा चला करते थे !
कभी वो भी नज़ारा देखा है इन आँखों ने ,
कि हमारे संग संग, हूरों के कारवां चला करते थे !
कहने को अपने हैं, मगर दिल से दूर हैं वो ,
जाने कोंन से हालात हैं, क्यों मज़बूर हैं वो !
छील डाला है #दिल ज़फाओं के खंज़र से,,
भला ये कैसे कह दूँ मैं, कि बे-कसूर हैं वो !
भूल गए वो तो हमारी वफ़ाओं के दिन भी,
अब दूसरों की महफ़िल के, चश्मेनूर हैं वो !
कहाँ है वक़्त उन पर अपनों से मिलने का,
कैसे कहूँ मैं आखिर कि, मस्ती में चूर हैं वो !
बावस्ता है हर कोई उनकी हरकतों से दोस्त,
पर अफ़सोस अपनी आदतों से, मज़बूर हैं वो !!!!